सोमवार, 6 जुलाई 2020

सावन का महीना (श्रावण मास)


हिंदू कैलेंडर के अनुसार पांचवा माह श्रावण मास यानि सावन का महीना होता है। श्रावण मास का आगमन आषाढ़ मास के बाद होता है। सावन का महीना वर्षा ऋतु के समय आती है इसलिए यह माह हरियाली भरी होती है। हिंदुओं के लिए यह माह विशेष होता है क्योंकि पूरे सावन माह भर भगवान शिव की पूजा की जाती है। वैसे तो पूरा सावन का महीना ही भगवान शिवजी के लिए विशेष होता है लेकिन सावन के महीने का हर सोमवार और भी ज्यादा विशेष होता है। सावन महीने के प्रत्येक सोमवार भगवान शिव जी की पूजा अर्चना की जाती है। हिंदू धर्म में सावन माह को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है तथा भगवान शिव जी की पूजा पाठ किया जाता है। इस माह में सभी श्रद्धालु गण कांवड़ यात्रा निकालते हैं तथा लंबे-लंबे दूर तक पैदल चलकर बम भोले या हर हर महादेव का नारा लगाते हुए कांवड़ यात्रा को संपन्न करते हैं। चूंकि यह माह भगवान शिव के लिए विशेष होता है इसलिए सभी श्रद्धालु गण भगवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक सोमवार उपवास रखते हैं तथा बेलपत्र, दूध, शहद, दही, घी, पानी  आदि सामग्री को चढ़ाते है। 

सावन का महीना (श्रावण मास)

कांवड़ यात्रा :


सावन माह की शुरुआत होने के बाद देशभर से कांवड़ तथा झंडा यात्रा का शुभारंभ भी हो जाता है। हर साल सावन के महीने भर देशभर में कई प्रसिद्ध श्रावणी मेलों और कांवड़ यात्रा का आयोजन किया जाता है। हर वर्ष इस मास की शुरुआत होते ही कोने-कोने से सैकड़ों शिव भक्त आस्था और उत्साह पूर्वक कांवड़ यात्राएं निकालते हैं। भारत में कांवड़ यात्रा वर्षों पुरानी एक विशेष धार्मिक परंपरा है, जो हर साल हर्षोउल्लास के साथ मनाई जाती है। इस दौरान भगवान शिव के भक्त, जिन्हे कांवडि़ए कहा गया है, वो मां गंगा और नर्मदा के तट से अपनी कांवड़ में पवित्र जल भरते हैं, और फिर बाद में उसी पवित्र जल से शिवालयों के शिवलिंग का जलाभिषेक करते हुए, महादेव को प्रसन्न करते हैं। इस तरह की शिव भक्त हजारों किलोमीटर चलकर कावड़ यात्रा को संपन्न करते हैं। कहा जाता है कि सावन का महीना भगवान शिव के लिए अति प्रिय होता है तथा यह महीना भगवान शिव जी को आसानी से प्रसन्न करने का माह होता है इसलिए सभी शिव भक्त भगवान शिव जी को प्रसन्न करने का प्रयास करते है उसमें कावड़ यात्रा भी सम्मिलित है।



कावड़ यात्रा का इतिहास :

हमारे भारत के विद्वानों के अनुसार यह मानना है कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’ का कांवड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था। परशुराम इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाए थे। यह सर्वप्रथम कांवड़ यात्रा था जिसे आज भी सभी शिव भक्तों के द्वारा किया जाता है।  आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग 'पुरा महादेव' का जलाभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है । इस तरह है यदि देखा जाए तो कांवड़ यात्रा हमारे प्राचीन काल से चली आ रही है। इसके साथ साथ हमारे विद्वान यह भी बताते हैं कि प्रभु श्री राम ने भी कावड़ यात्रा करके भगवान शिव जी को जलाभिषेक किए थे । रावण भी कांवड़ यात्रा करके भगवान शिव जी को जलाभिषेक किए थे। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि श्रवण कुमार ने भी कावड़ यात्रा की थी।


सावन का महीना (श्रावण मास)


सावन सोमवार पूजा :



महादेव को भोलेनाथ भी कहा जाता है क्योंकि महादेव को केवल श्रद्धा पूर्वक जल चढ़ाकर भी प्रसन्न किया जा सकता है। लेकिन जब पूजा विधि की बात आती है तब हमें सामान्य विधि के तौर पर हर सावन सोमवार को सुबह उठकर नहा धोकर स्वच्छ मन से पूजा करना चाहिए। पूजा स्थल को स्वच्छ रखें तथा गंगाजल का उपयोग करके उस जगह को पवित्र बना ले। भगवान शिव जी को श्रद्धा पूर्वक सुपारी, पंच अमृत, नारियल, बेल पत्र, धतूरा, फल, फूल आदि अर्पित कर सकते हैं। दीपक जलाकर महादेव को ध्यान लगाएं। शिव पुराण, शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र आदि का पाठ कर सकते हैं । 
          श्रावण माह भगवान शिव जी का अत्यंत प्रिय मास है। इस मास में शिव की भक्ति करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। उनके पूजन के लिए अलग-अलग विधान भी है। भक्त जैसे चाहे उनका अपनी कामनाओं के लिए उनका पूजन कर सकता है। सावन के महीने में प्रतिदिन श्री शिवमहापुराण व शिव स्तोस्त्रों का विधिपूर्वक पाठ करके दुध, गंगा जल, बेलपत्र, फलादि सहित शिवलिंग का पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही इस मास में “ऊँ नम: शिवाय:” मंत्र का जाप करते हुए शिव पूजन करना अत्यंत ही लाभकारी माना जाता है।


 सावन माह का मेला :

सावन के इस पवित्र माह में भारत के बहुत जगहों पर सावन मेला का भी आयोजन किया जाता है तथा इस मेला में घूमने के लिए भारत के कोने कोने से लोग घूमने आते हैं ।


१. काशी विश्वनाथ मेला :


सावन माह में काशी में सावन मेला का आयोजन किया जाता है। काशी के विश्वनाथ के दर्शन के लिए भारत के कोने-कोने से लोग आते हैं। यहां कांवड़ियों का भी भीड़ बहुत ज्यादा होता है ।

२. हरिद्वार का सावन मेला :


 हरिद्वार में सबसे बड़ा सावन मेला का आयोजन किया जाता है। सावन माह के शुरू होते ही यहां कांवड़ियों का आना चालू हो जाता है। यहां पर भारत के कोने कोने से भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं तथा पूजा पाठ करते हैं। जितने भी कांवड़िया यहां आते हैं वह गंगा जल को लेकर वापस होते हैं।


३. झारखंड में सावन मेला :


झारखंड के देवघर में भी सावन मेला का आयोजन किया जाता है। हर साल करोड़ों कांवड़िये झारखंड के देवघर जिला स्थित विश्व प्रसिद्ध वैद्यनाथ धाम में बिहार के सुल्तानगंज में गंगा नदी से जल लेकर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक का जलाभिषेक करते हैं। देवघर का सावन मेला भगवान शिव के सबसे बड़े मेलों में शुमार है। यहां सावन मेला को बड़े धूम धाम के साथ मनाते हैं।

४. लखीमपुर का सावन मेला :


सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही भोले के भक्त पूरी भक्ति के साथ प्रभु का गुणगान करते हैं। छोटी काशी के नाम से विख्यात पौराणिक नगरी में सावन का मेला शुरू होते ही देश प्रदेश के लाखों श्रद्धालु अवढरदानी के जलाभिषेक को उमड़ते हैं।




निष्कर्स :

इस तरह हमारे भारतीय संस्कृति में सावन माह का विशेष महत्व है और मैंने इस पोस्ट में यही बताने का प्रयाश किया है ।




🚩🚩 आपका दिन शुभ एवम् मंगलमय हो 🚩🚩


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शनिवार, 4 जुलाई 2020

सोमनाथ मंदिर

सोमनाथ मंदिर हमारे भारत देश के गुजरात राज्य में स्थित है। यह मंदिर गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित है। यह एक प्राचीन मंदिर है जो हिंदुओं का आस्था का केंद्र है। यह मंदिर प्राचीन तथा ऐतिहासिक सूर्य मंदिर है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम ज्योतिर्लिंग इसी सोमनाथ मंदिर को कहा जाता है। इस तरह सोमनाथ मंदिर हिंदुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है। यह मंदिर भारत के गुजरात राज्य के पश्चिमी छोर के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित है। ऋग्वेद के अनुसार इस सोमनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्रदेव ने की थी। चंद्र देव का एक नाम सोम भी है तथा चंद्रदेव ने भगवान शिव जी को पूज्य तथा अपना नाथ मानकर इसी समुद्र के किनारे तपस्या की थी। इस तरह मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ा। सोमनाथ मंदिर समुद्र के किनारे स्थित है। महाशिवरात्रि के दिन बड़े ही धूमधाम के साथ भगवान शिव जी की पूजा अर्चना की जाती है तथा यहां इसे एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है।


सोमनाथ मंदिर


सोमनाथ मंदिर का इतिहास :


सोमनाथ मंदिर  का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है । इस मंदिर का वास्तु कला ऐसा था कि सब लोग देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। कहते हैं कि ज्योतिर्लिंग हवा में स्थित था। यह सब देख कर उस समय के शासक प्राय: मुस्लिम शासक मंदिर को तुड़वा दिया। ऐसा प्रयास बहुत बार किया गया। इस प्रकार यह मंदिर कई बार टूटा और कई बार इसका पुनर्निर्माण किया गया ।
            सबसे पहले इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। इसी जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था । उसके बाद प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इस मंदिर का पुनर्निर्माण का कार्य करवाया।
          समय बीतता गया फिर महमूद गजनवी ने सन् 1024 में अपने लगभग 5,000 साथियों के साथ इस मंदिर पर हमला कर किया । इस मंदिर की संपत्ति को लूट लिए तथा इसे नष्ट कर दिया। तब इस गंभीर परिस्थिति को देखकर इस प्राचीन मंदिर की रक्षा के लिए निहत्‍थे हजारों लोगो ने विरोध किए तथा वे लोग मारे गए। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मंदिर के अंदर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मंदिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे। इस तरह सोमनाथ मंदिर की काफी क्षति हुई थी।महमूद के मंदिर तोड़ने और लूटने के बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग दिया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ मंदिर के सौन्दर्यीकरण में योगदान किया था।
                  सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मंदिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-संपदा लूटकर ले गया। मंदिर को फिर से हिन्दू राजाओं ने बनवाया। लेकिन सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्‍फरशाह ने मंदिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1412 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया। मुस्लिम शासकों के द्वारा सोमनाथ मंदिर को तुड़वाने का सिलसिला जारी था तथा हिंदू राजा इन्हें बनाने का प्रयास किए। 
        उसके बाद मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया। जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के अधिकार में आ गया तब 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया। इस तरह हिंदू शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण तथा हिंदू आस्था को बरकरार रखने का अटूट प्रयास किया और इन्हीं सब प्रयासों के कारण ही अभी हम वर्तमान समय में सोमनाथ मंदिर का दर्शन कर पाते हैं ।
     भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र का जल लेकर नए मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया। उनके संकल्प के बाद 1950 में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। इस तरह मंदिर का 6 बार टूटने के बाद 7वीं बार इस मंदिर को कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में बनाया गया। इसके निर्माण कार्य से सरदार वल्लभभाई पटेल भी जुड़े रह चुके हैं। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने बनवाया और दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
सोमनाथ मंदिर


 सोमनाथ मंदिर का महत्व

              
 सोमनाथ मंदिर अरब सागर के तट पर स्थित है। सोमनाथ मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा करने पर सारे पाप धुल जाते हैं। भोलेनाथ और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। सोमनाथ मंदिर के ज्योतिर्लिंग की पूजा करने से जीवन सुखद हो जाता है, मन को शांति प्राप्त होती है।यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप- तीन प्रमुख भागों में विभाजित है। इसका 150 फुट ऊंचा शिखर है। इसके शिखर पर स्थित कलश का भार लगभग दस टन है और इसकी ध्वजा लगभग 27 फुट ऊंची है। इसके अबाधित समुद्री मार्ग- त्रिष्टांभ के विषय में ऐसा माना जाता है कि यह समुद्री मार्ग परोक्ष रूप से दक्षिणी ध्रुव में समाप्त होता है। यह हमारे प्राचीन ज्ञान का अद्‍भुत साक्ष्य माना जाता है। इस तरह सोमनाथ मंदिर हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। यहां चंद्रदेव में तपस्या की थी तथा शिव जी और माता पार्वती ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां विराजमान हैं। जो भी भक्त यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं उनकी मनोकामना पूर्ण होती है तथा मन की शांति प्राप्त होती है। यहां आकर पूजा करने से सारे पाप धुल जाते हैं तथा जीवन सफल हो जाता है। इस मंदिर का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है तथा पूरे विश्व भर से यहां घूमने तथा भगवान शिव का दर्शन करने आते हैं। महाशिवरात्रि के दिन पर्व के रूप में भगवान शिव जी की पूजा अर्चना की जाती है तथा बड़े धूमधाम के साथ यह पर्व मनाया जाता है।




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गुरुवार, 2 जुलाई 2020

भारत की प्राचीन स्थापत्यकला


भारत की प्राचीन स्थापत्य कला हमारे भारतीय संस्कृति का सजीव चित्रण करती है। भारत में प्राचीन स्थापत्य कला का ऐसा चित्रण दिखता है जिसे देखकर विश्व भर के लोग चकित रह जाते हैं क्योंकि भारत में विभिन्न शैलियों के आधार पर स्थापत्य कला का उपयोग किया गया है। भारत के प्राचीन स्थापत्य कला को देखकर विश्व भर के लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं क्योंकि इतने पुराने समय में भी इतनी बारिकी से मनोरम रूप देना, कुछ हद तक आधुनिकता में भी संभव नहीं। 
भारत की प्राचीन स्थापत्यकला

 

भारत की प्राचीन संरचना तथा स्थापत्य कला :


हमारे भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता है। जब से इसके बारे में बताया चला है तब से नया-नया रहस्य खुलता रहा है तथा स्थापत्य कला के बारे में भी पता चलता रहा है। इन सब चीजों को देखकर यह लगता है कि उस समय के लोग भी अपना विचार व्यक्त करने के लिए दीवारों पर खुदाई कर देते थे तथा अपने स्थापत्य कला का प्रदर्शन करते थे।सीमित आवश्यकताओं में विश्वास रखनेवाले, अपने कृषिकर्म और आश्रमजीवन से संतुष्ट आर्य प्राय: ग्रामवासी थे और शायद इसीलिए, अपने परिपक्व विचारों के अनुरूप ही, समसामयिक सिंधु घाटी सभ्यता के विलासी भौतिक जीवन की चकाचौंध से अप्रभावित रहे। कुछ भी हो, उनके अस्थायी निवासों से ही बाद के भारतीय वास्तु का जन्म हुआ प्रतीत होता है। इसका आधार धरती में और विकास वृक्षों में हुआ, जैसा वैदिक वाङ्मय में महावन, तोरण, गोपुर आदि के उल्लेखों से विदित होता है। अत: यदि उस अस्थायी रचनाकाल की कोई स्मारक कृति आज देखने को नहीं मिलती, तो कोई आश्चर्य नहीं।
      समय की धारा के साथ वक्त बीतता गया तथा धीरे-धीरे नगरों की भी रचना हुई और स्थायी निवास भी बने। बिहार में मगध की राजधानी राजगृह शायद 8वीं शती ईसा पूर्व में उन्नति के शिखर पर थी। यह भी पता लगता है कि भवन आदिकालीन झोपड़ियों के नमूने पर प्रायः गोल ही बना करते थे। दीवारों में कच्ची ईंटें भी लगने लगी थीं और चौकोर दरवाजे खिड़कियाँ बनने लगी थीं। यह सब चीजें उस समय की मानसिकता को भी प्रदर्शित करती है। बौद्ध लेखक धम्मपाल के अनुसार, पाँचवीं शती ईसा पूर्व में महागोविन्द नामक स्थपति ने उत्तर भारत की अनेक राजधानियों के विन्यास तैयार किए थे। चौकोर नगरियाँ बीचोबीच दो मुख्य सड़कें बनाकर चार चार भागों में बाँटी गई थीं। एक भाग में राजमहल होते थे, जिनका विस्तृत वर्णन भी मिलता है। सड़कों के चारों सिरों पर नगरद्वार थे। मौर्यकाल (4थी शती ई. पू.) के अनेक नगर कपिलवस्तु, कुशीनगर, उरुबिल्व आदि एक ही नमूने के थे, यह इनके नगरद्वारों से प्रकट होता है। जगह-जगह पर बाहर निकले हुए छज्जों, स्तंभों से अलंकृत गवाक्षों, जँगलों और कटहरों से बौद्धकालीन पवित्र नगरियों की भावुकता का आभास मिलता है।
                 उदाहरण के तौर पर हम आपको कुछ स्थापत्य कला के बारे में बता रहे हैं जो विश्व का आकर्षण का केंद्र है जैसे कि मीनाक्षी मंदिर मदुरई, खजुराहो का कंदारिया महादेव मंदिर, आबू पर्वत पर स्थित देलवाड़ा जैन मंदिर आदि। इन सब जगहों पर स्थापत्य कला का चित्रण मिलता है। 


भारत की प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता :


सिंधु घाटी सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है जो आज से लगभग 5000 वर्ष पुराना सभ्यता है। सिंधु घाटी सभ्यता में मिले अवशेष से यह पता चलता है कि वे लोग एक पुरी व्यवस्था के साथ जीवन यापन करते थे। जब पूरे विश्व में जागरण का दौर नहीं था उस समय भारत पर व्यवस्थित सभ्यता थी। सोच सकते हैं कि आज से लगभग 5000 वर्ष पहले लोगों को पता था कि आने जाने के लिए सड़क होना चाहिए तथा पानी निकास के लिए नाली होनी चाहिए और रहने के लिए आवास की आवश्यकता है। उस समय के लोगों का नगर नियोजन संबंधित ज्ञान में परिपक्व थे। उस समय के मिले अवशेष से यह पता चलता है कि वे लोग ज्यादा मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते थे क्योंकि मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं। शिव की मूर्ति मिली है। इस प्रकार वे लोग निराकार शक्ति पर विश्वास रखते थे। सिंधु घाटी सभ्यता 1750 ईसा पूर्व आने तक खत्म हो गया। कारण का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन नदी के किनारे बसे रहने के कारण बह गया या नष्ट हो गया।
          


आर्यन की सभ्यता :


1500 ईसा पूर्व में आर्यंस है और यही लोग वेद और उपनिषद लिखे। उनका कार्यकाल 1500 से 500 ईसा पूर्व तक था । इस तरह धीरे-धीरे एक पूरी सभ्यता विकसित होने लगी। पहले तो सभ्यता विकसित हुई थी हमें सिंधु घाटी नदी के किनारे हुई थी फिर बाद में धीरे-धीरे वे लोग गंगा नदी की ओर बढ़ने लगे तथा गंगा नदी के किनारे रहना चालू किए। चूंकि हम जानते हैं कि यदि कोई सभ्यता विकसित करनी हो तो नदी का रहना जरूर है  क्योंकि यदि नदी है तो खेती किसानी मैं दिक्कत नहीं होती और यदि अन्य भरपूर है तो सभ्यता विकसित करने में दिक्कत नहीं जाती। आर्यंस का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था । 
               यह तो केवल हमारी भारतीय संस्कृति की शुरुआत है। धीरे धीरे समय की धारा के साथ साथ बहुत सारी सभ्यताएं आए तथा अभी अपने अवशेष छोड़ गए। फिर यह सभ्यताएं धीरे धीरे राजवंश को ग्रहण कर लिया। फिर बहुत सारे राजवंश शासक हुए जिन्होंने शासन किया और बहुत सारे स्थापत्य कला का भरपूर प्रयोग किया। प्रारंभिक में हमारी भारतीय संस्कृति हिंदू धर्म पर आधारित थी तत्पश्चात बहुत सारे धर्म का विकास हुआ और उन्होंने भी हमारे देश भारत पर शासन किया। 


भारतीय स्थापत्य कला की विशेषता :


 भारतीय स्थापत्य कला की विशेषताएं यह हैं कि सजीव चित्रण करता है। यदि हम भारत के प्राचीन स्थापत्य कला को देखते हैं तो उस समय काल की पूरी परिस्थितियां, युगो पुराना पौराणिक गाथाएं, मूर्ति कला का मनोरम चित्रण तथा बहुत सारी चीजें दीवारों पर खोदकर प्रदर्शित किया जाता था और इनको इतनी बारीकी से करते थे कि आधुनिकता की तकनीकी भी असक्षम है। भारत हिंदू प्रधान देश है तथा यहां बहुत सारी प्राचीन मंदिर भी बनी हुई है। भारत की प्राचीन स्थापत्य कला का सुंदर चित्रण यहां के मंदिरों के दीवारों पर दिखाई देती है। भारत में मंदिर बनाने का समय काल मौर्य काल से शुरू हुआ। समय के साथ साथ मंदिर बनाने के तरीका में परिवर्तन होना शुरू हुआ। जब हम प्राचीन मंदिर को देखते हैं तब दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तिया बनी हुई होती हैं जो बड़ा ही अच्छा लगता है। इस तरह हमारे भारत के प्राचीन स्थापत्य कला भारत की प्राचीन भारतीय संस्कृति को बड़े ही अच्छे ढंग से प्रदर्शित करती है।
        हम आपको हमारे ब्लॉक में भारतीय स्थापत्य कला के बारे में और भी जानकारी देंगे। इसके लिए आप हमारे ब्लॉक के साथ जुड़े रहे हैं।



🚩🚩 आपका दिन शुभ एवम् मंगलमय हो 🚩🚩


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मंगलवार, 30 जून 2020

भारतीय संस्कृति का जीवनशैली पर प्रभाव


हमारे भारतीय संस्कृति का मनुष्य के जीवन शैली पर गहरा प्रभाव पड़ता है। संस्कृति मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाती है। संस्कृति मनुष्य को नियमों में बांध कर रखती है ताकि मनुष्य का जीवन खुशहाल एवं सुखमय हो। इसका अर्थ यह नहीं कि संस्कृति मनुष्य को जकड़ कर रखी हुई है । हमारे भारतीय संस्कृति का प्रभाव ऐसा है कि विश्व के लोग प्रभावित हो जाते हैं और बहुत सारे लोग जो विदेश से आते हैं भारतीय संस्कृति के बारे में अध्ययन करते हैं तथा उसे अपना कर अपने मन को शांत करते हैं। मनुष्य में भारतीय संस्कृति का प्रभाव उसके हर क्रिया पर दिखाई पड़ता है जैसे कि उठना, बैठना, किसी से बात करना, अभिवादन आदि। जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो उस बच्चे का नामकरण विधिवत होता है तब से लेकर उस मनुष्य के मरने तक बहुत सारे संस्कार होते हैं। जब किसी से मिलते हैं तब अभिवादन में 'नमस्कार ' कहते हैं। यदि देखा जाए तो मनुष्य को मनुष्य के साथ जोड़ने का काम संस्कृति करती है। उदाहरण के तौर पर यदि जब हम किसी अनजान आदमी से मिलते हैं और उसे बड़ी नम्रता के साथ आदर पूर्वक बात करते हैं तो उन्हें अच्छा लगता है और इस तरह पहचान बन जाती है। हमारी संस्कृति में बड़ों का प्रणाम करने का रिवाज है जब हम बड़ों को प्रणाम करते हैं तो बड़ों का हमारे प्रति प्रेम बढ़ जाता है। संस्कृति मनुष्य को संस्कार युक्त बनाती है। संस्कृति कभी भी मनुष्य को यह नहीं सिखाती है कि किसी का अनादर करें या अपमान करें।
भारतीय संस्कृति का जीवनशैली पर प्रभाव

मनुष्य को अपनी संस्कृति का पालन करना चाहिए । भारत में मेहमान को देवता समान माना गया है तभी तो कहते हैं " अतिथि देवो भव " । यह सब चीजें बच्चों को सिखाया जाता है ताकि बच्चे संस्कृति को समझ सके। संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र स्वरूप का नाम है, जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने के स्वरूप में अन्तर्निहित होता है। अंग्रेजी में संस्कृति के लिये 'कल्चर' शब्द प्रयोग किया जाता है जो लैटिन भाषा के ‘कल्ट या कल्टस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है जोतना, विकसित करना या परिष्कृत करना और पूजा करना। संक्षेप में, किसी वस्तु को यहाँ तक संस्कारित और परिष्कृत करना कि इसका अंतिम उत्पाद हमारी प्रशंसा और सम्मान प्राप्त कर सके। यह ठीक उसी तरह है जैसे संस्कृत भाषा का शब्द ‘संस्कृति’। कहा जाता है कि जिस मनुष्य में संस्कृति होता है उसका जीवन सावर जाता है और इसके उल्टा जिस मनुष्य में संस्कृति नहीं पाई जाती उसकी जिंदगी बेकार हो जाती है क्योंकि उसे जीवन जीने की सही कला का पता ही नहीं होता है।


भारतीय संस्कृति का जीवनशैली पर प्रभाव


 भारतीय संस्कृति का जन्म :


किसी देश की संस्कृति उसकी सम्पूर्ण मानसिक निधि को सूचित करती है। यह किसी खास व्यक्ति के पुरुषार्थ का फल नहीं, जबकि असंख्य ज्ञात तथा अज्ञात व्यक्तियों के भगीरथ प्रयत्न का परिणाम होती है। सब व्यक्ति अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार संस्कृति के निर्माण में सहयोग देते हैं। इसी सहयोग के कारण किसी देश की संस्कृति का निर्माण होता है। किसी भी देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए उस देश की संस्कृति का होना अनिवार्य है। जैसे कि हमारे भारतीय संस्कृति है और हमारी भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों से चली आ रही है तथा सबसे प्राचीन संस्कृति में से एक है। संस्कृति की तुलना आस्ट्रेलिया के निकट समुद्र में पाई जाने वाली मूँगे की भीमकाय चट्टानों से की जा सकती है। मूँगे के असंख्य कीड़े अपने छोटे घर बनाकर समाप्त हो गए। फिर नए कीड़ों ने घर बनाये, उनका भी अन्त हो गया। इसके बाद उनकी अगली पीढ़ी ने भी यही किया और यह क्रम हजारों वर्ष तक निरन्तर चलता रहा। आज उन सब मूगों के नन्हे-नन्हे घरों ने परस्पर जुड़ते हुए विशाल चट्टानों का रूप धारण कर लिया है। संस्कृति का भी इसी प्रकार धीरे-धीरे निर्माण होता है और उनके निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं। मनुष्य विभिन्न स्थानों पर रहते हुए विशेष प्रकार के सामाजिक वातावरण, संस्थाओं, प्रथाओं, व्यवस्थाओं, धर्म, दर्शन, लिपि, भाषा तथा कलाओं का विकास करके अपनी विशिष्ट संस्कृति का निर्माण करते हैं। भारतीय संस्कृति की रचना भी इसी प्रकार हुई है ।



संस्कृति और सभ्यता  का क्षेत्र



संस्कृति और सभ्यता दोनों शब्द प्रायः पर्याय के रूप में उपयोग कर दिये जाते हैं। लेकिन दोनों में मौलिक भिन्नता है और दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं। संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है और उसका निवास उसके मानस में होता है। दूसरी ओर, सभ्यता का क्षेत्र व्यक्ति और समाज के बाह्य स्वरूप से है। 'सभ्य' का शाब्दिक अर्थ होता है, 'जो सभा में सम्मिलित होने योग्य हो'। इसलिए, सभ्यता ऐसे सभ्य व्यक्ति और समाज के सामूहिक स्वरूप को आकार देती है। लेकिन यदि देखा जाए तो संस्कृति तथा सभ्यता दोनों ही सामान ही है ।
               सत्य, शिव और सुन्दर ये तीन शाश्वत मूल्य हैं जो संस्कृति से निकट से जुड़े हैं। यह संस्कृति ही है जो हमें दर्शन और धर्म के माध्यम से सत्य के निकट लाती है। यह हमारे जीवन में कलाओं के माध्यम से सौन्दर्य प्रदान करती है और सौन्दर्यनुभूतिपरक मानव बनाती है। यह संस्कृति ही है जो हमें नैतिक मानव बनाती है और दूसरे मानवों के निकट सम्पर्क में लाती है और इसी के साथ हमें प्रेम, सहिष्णुता और शान्ति का पाठ पढ़ाती है। इस तरह संस्कृति मानव समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनाती है। 



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सोमवार, 29 जून 2020

भारत और चीन संबंध


भारत और चीन दोनों ही पड़ोसी देश है। विश्व स्तर पर देखा जाए तो दोनों ही देशों की गिनती विकासशील देशों में की जाती है। जनसंख्या के मामले में भी दोनों देश विश्व स्तर पर आगे है। दोनों के बीच लम्बी सीमा-रेखा है। इन दोनों में प्रचीन काल से ही सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्ध रहे हैं। भारत से बौद्ध धर्म का प्रचार चीन की भूमि पर हुआ है। चीन के लोगों ने प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भारत के विश्वविद्यालयों अर्थात् नालन्दा विश्वविद्यालय एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय को चुना था क्योंकि उस समय संसार में अपने तरह के यही दो विश्वविद्यालय शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र थे। उस काल में यूरोप के लोग जंगली अवस्था में थे। इस तरह देखा जाए तो भारत और चीन दोनों ही देशों के बीच बहुत पुराना रिश्ता रहा है। लेकिन वर्तमान में देखा जाए तो सीमा विवाद और कुछ विवाद दोनों देशों के बीच गरमाया रहता है। वर्तमान स्थिति में दोनों देशों के संबंध के बारे में समझने के लिए दोनों देशों के बीच प्राचीन काल से ही क्या संबंध रहा है इसको समझना बहुत जरूरी है। जैसा कि बताया कि भारत और चीन दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध रहा है। 
भारत और चीन संबंध


1946 में चीन के साम्यवादी शासन की स्थापना हुई। दोनों देशों के बीच मैत्री सम्बन्ध बराबर बने रहे। जापानी साम्राज्यवाद के विरूद्ध चीन के संघर्ष के प्रति भारत द्वारा सहानभूति प्रकट की गई एवं पंचशील पर आस्था भी प्रकट की गई। वर्ष 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद आने वाले अगले वर्ष, भारत ने चीन के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये। इस तरह भारत, चीन लोक गणराज्य को मान्यता देने वाला प्रथम गैर-समाजवादी देश बना। इसके बाद चीन और भारत दोनों देशों के बीच बहुत सारे विवाद भी हुए तथा बहुत सारी राजनीतिक मुलाकात भी हुई। चीन ने सन 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया और भारत की बहुत सारी जमीन पर कब्जा कर लिया । इतना सब कुछ करने के बाद चीन ने 21 नवंबर सन 1962 युद्ध विराम की घोषणा कर दी यह निर्णय एकपक्षीय था। इस तरह 1962 के बाद से लेकर वर्तमान तक चीन और भारत दोनों की स्थितियां सामान्य नहीं हो पाई । बीच-बीच में विवाद बहुत बड़ा रूप ले लेती है।
          भारत और चीन के बीच बहुत बड़ा आर्थिक संबंध भी है। दोनों देशों के द्वारा एक दूसरे के देश में आर्थिक निवेश किया जाता है।चीन और भारत के बीच अरबों डॉलर का व्यापार है। 2008 में चीन भारत का सबसे बड़ा बिज़नेस पार्टनर बन गया था। 2014 में चीन ने भारत में 116 बिलियन डॉलर का निवेश किया जो 2017 में 160 बिलियन डॉलर हो गया। 2018-19 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 88 अरब डॉलर रहा। यह बात महत्वपूर्ण है कि पहली बार भारत, चीन के साथ व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर तक कम करने में सफल रहा।चीन वर्तमान में भारतीय उत्पादों का तीसरी बड़ा निर्यात बाजार है। वहीं चीन से भारत सबसे ज्यादा आयात करता है और भारत, चीन के लिए उभरता हुआ बाज़ार है। चीन से भारत मुख्यतः इलेक्ट्रिक उपकरण, मेकेनिकल सामान, कार्बनिक रसायनों आदि का आयात करता है। वहीं भारत से चीन को मुख्य रूप से, खनिज ईंधन और कपास आदि का निर्यात किया जाता है। भारत में चीनी टेलिकॉम कंपनियाँ 1999 से ही हैं और वे काफी पैसा कमा रही हैं। इनसे भारत को भी लाभ हुआ है। भारत में चीनी मोबाइल का मार्केट भी बहुत बड़ा है। चीन दिल्ली मेट्रो में भी लगा हुआ है। दिल्ली मेट्रो में एसयूजीसी (शंघाई अर्बन ग्रुप कॉर्पोरेशन) नाम की कंपनी काम कर रही है। भारतीय सोलर मार्केट चीनी उत्पाद पर निर्भर है। इसका दो बिलियन डॉलर का व्यापार है। भारत का थर्मल पावर भी चीनियों पर ही निर्भर है। पावर सेक्टर के 70 से 80 फीसदी उत्पाद चीन से आते हैं। इस तरह चीन का भारत के साथ बहुत बड़ा व्यापारिक संबंध भी है।




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शनिवार, 27 जून 2020

संस्कृति का प्रकृति के साथ जुड़ाव


जब हम प्रकृति के बारे में बात करते हैं तब हम यह देखते हैं कि हमारी संस्कृति का प्रकृति के साथ सामंजस्य जुड़ता है। हमारी भारतीय संस्कृति का प्रकृति के साथ जुड़ाव नजर आते हैं। यह हमारी संस्कृति का प्रकृति के प्रति प्रेम दिखाई पड़ता है। प्रकृति की समय धारा के साथ हमारी भारतीय संस्कृति में तरह-तरह के त्यौहार तथा रीति रिवाज दिखाई पड़ता है। हमने अपनी संस्कृति को प्रकृति के साथ जोड़ दिया है। हमारे भारतीय संस्कृति में पेड़ पौधों की पूजा की जाती है यह भी प्रकृति के प्रति श्रद्धा को प्रदर्शित करता है। पीपल और बरगद जैसे विशाल वृक्ष को हम पूज्य तुल्य समझते हैं और हम जानते हैं यह विशाल वृक्ष हमें भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करता है। कहां जाता है जो क्षेत्र पीपल और बरगद के वृक्ष से ढका हुआ रहता है उसके चारों ओर ऑक्सीजन की मात्रा 25% अत्यधिक होती है। पशु पक्षियों को भी संस्कृति के तहत पूज्य तुल्य समझते हैं। गाय को माता समझा जाता है क्योंकि गाय माता की प्रेम, शालीनता आदि मनुष्य को भाती है। गौ माता का गोबर तथा मूत्र को पवित्र माना जाता है। भारत के प्रायः हर घर में तुलसी का पौधा पाया जाता है क्योंकि तुलसी को पवित्र माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो तुलसी का पौधा ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में प्रदान करती है तथा तुलसी का पौधा बहुत सारे दवाइयां में भी उपयोग लाई जाती है। इस पौधे का उपयोग पूजा पाठ में भी किया जाता है। 
संस्कृति का प्रकृति के साथ जुड़ाव

भारतीय संस्कृति के हिंदू धर्म में प्रकृति के पंचतत्व को देव तुल्य समझते हैं। हवा को वायु देव, आग अग्नि देव, धरती को माता कहा जाता है, बारिश के लिए इंद्र देव की पूजा की जाती है। सूरज को सूर्य देव, चंद्रमा को चंद्रदेव, ब्रह्मांड के सभी ग्रहों की भी पूजा की जाती है। 
         हिंदू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मां स्वरूप माना गया है।
            प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है।
            जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- 'अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु।' यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्वद्र्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है। सम्राट विक्रमादित्य और अशोक के शासनकाल में वन की रक्षा सर्वोपरि थी। चाणक्य ने भी आदर्श शासन व्यवस्था में अनिवार्य रूप से अरण्यपालों की नियुक्ति करने की बात कही है।
              हमारे भारतीय संस्कृति में प्रकृति के हर चीज का विशेष महत्व है। हर पुष्प का उपयोग हिंदू धर्म में अलग-अलग भगवान को अर्पित करने के लिए किया जाता है जैसे लक्ष्मी माता को कमल का फूल पसंद है तथा गुलाब का उपयोग लक्ष्मी माता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है । गणेश भगवान को प्रसन्न करने के लिए दूर्वा का उपयोग किया जाता है । प्रकृति के हर जानवर को हिंदू संस्कृति के तहत भगवान के वाहन के तौर पर जोड़ दिया गया है जैसे कि चूहा गणेश भगवान का वाहन है, नंदी महादेव के वाहन है, शेर दुर्गा माता के वाहन हैं आदि । इस तरह हम देख सकते हैं कि भारतीय संस्कृति का आखिर किस तरह प्रकृति के साथ जुड़ाव है।



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गुरुवार, 25 जून 2020

छत्तीसगढ राज्य की संस्कृति : भाग - 01


"सब्बो संगवारी मन ला जय जोहार" 




छत्तीसगढ़ हमारे भारत देश का एक राज्य है। इसका गठन १ नवम्बर २००० को हुआ था और यह भारत का २६वां राज्य है। पहले यह मध्यप्रदेश के अन्तर्गत था । कहते हैं कि किसी समय में इस क्षेत्र में 36 गढ़ थे, इसलिए इसका नाम छत्तीसगढ़ पड़ा । लेकिन गढ़ों की संख्या में परिवर्तन होने के बावजूद नाम पर कोई असर नहीं पड़ा । भारत का छत्तीसगढ़ राज्य सभी राज्यों में से एक ऐसा राज्य है जिसे महतारी मतलब मां का दर्जा दिया जाता है । भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो मगध जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा "दक्षिण कौशल" जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है। एक संसाधन संपन्न राज्य, यह देश के लिए बिजली और इस्पात का एक स्रोत है, जिसका उत्पादन कुल स्टील का 15% है। छत्तीसगढ़ भारत में सबसे तेजी से विकसित राज्यों में से एक है । 
छत्तीसगढ राज्य की संस्कृति : भाग - 01

 हम आपको  अपने भारत की प्राचीन भारतीय संस्कृति ब्लॉग के तहत भारत के हर राज्य की संस्कृति के बारे में बताएंगे। फिलहाल अभी भारत की छत्तीसगढ़ राज्य के संस्कृति के बारे में बता रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति भी विशाल है। यहां की संस्कृति के बारे में जब अध्ययन करते हैं तब यहां की संस्कृति, सभ्यता, वेशभूषा, भाषा, बोली, रहन सहन, खानपान, त्योहार, आदि में एक विशेषता दिखाई पड़ती है। छत्तीसगढ़ राज्य की भाषा छत्तीसगढ़ी है जिसे यहां के लोग छत्तीसगढ़ी भाखा कहते हैं। इसके साथ साथ छत्तीसगढ़ में बहुत सारी बोलियां तथाा भाषाएं बोली जाती है। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक संरचना भी इस राज्य की सुंदरता को बढ़ा देती है। छत्तीसगढ़़ राज्य अभी भी घनेे जंगलों को संभाल कर रखी हुई है।
छत्तीसगढ राज्य की संस्कृति : भाग - 01

छत्तीसगढ़ की संस्कृति सम्पूर्ण भारत में अपना बहुत ही ख़ास महत्त्व रखती है। भारत के हृदय-स्थल पर स्थित छत्तीसगढ़, जो भगवान श्रीराम की कर्मभूमि रही है। प्राचीन कला, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और पुरातत्त्व की दृष्टि से अत्यंत संपन्न है। यहाँ ऐसे भी प्रमाण मिले हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि अयोध्या के राजा श्रीराम की माता कौशल्या छत्तीसगढ़ की ही थी। छत्तीसगढ़ में कौशल्या माता का मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से २५ किलोमीटर दूर पर एक गांव चंदखुरी में स्थित है। यह मंदिर जनसेन तालाब के बीचोबीच स्थित है। 'छत्तीसगढ़ की संस्कृति' के अंतर्गत अंचल के प्रसिद्ध उत्सव, नृत्य, संगीत, मेला-मड़ई तथा लोक शिल्प आदि शामिल हैं।

छत्तीसगढ राज्य की संस्कृति : भाग - 01
इंडिया गेट, दिल्ली में प्रस्तुत छत्तीसगढ़ की झांकी
छत्तीसगढ राज्य की संस्कृति : भाग - 01
                                                     इंडिया गेट, दिल्ली में प्रस्तुत छत्तीसगढ़ की झांकी


त्योहार :

बस्तर का 'दशहरा', रायगढ़ का 'गणेशोत्सव' तथा बिलासपुर का 'राउत मढ़ई' ऐसे ही उत्सव हैं, जिनकी अपनी एक बहुत-ही विशिष्ट पहचान है। पंडवानी, भरथरी, पंथी नृत्य, करमा, दादरा, गैड़ी नृत्य, गौरा, धनकुल आदि की स्वर माधुरी भाव-भंगिमा तथा लय में ओज और उल्लास समाया हुआ है। छत्तीसगढ़ की शिल्पकला में परंपरा और आस्था का अद्भुत समन्वय विद्यमान है। यहाँ की पारंपरिक शिल्पकला में धातु, काष्ठ, बांस तथा मिट्टी एकाकार होकर अर्चना और अलंकरण के लिए विशेष रुप से लोकप्रिय हैं। संस्कृति विभाग ने कार्यक्रमों में पारंपरिक नृत्य, संगीत तथा शिल्पकला का संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ कलाकारों को अवसर भी प्रदान किये हैं। इस तरह छत्तीसगढ़ राज्य त्योहारों एवं पर्वों में भी अग्रणी है।


इस तरह हम छत्तीसगढ़ के संस्कृति के संबंध में और भी जानकारी आगे देंगे जैसे कि छत्तीसगढ़ की लोकप्रिय नृत्य, छत्तीसगढ़ पुरातत्व से संबंधित जानकारी, छत्तीसगढ़ की लोक गीत आदि । इसके लिए आप हमारे ब्लॉक से जुड़े रहें।



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मंगलवार, 23 जून 2020

जगन्नाथ रथ यात्रा


श्री जगन्नाथ रथ यात्रा को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं हैं। स्कंद पुराण के अनुसार एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की इच्छा प्रभु जगन्नाथ के सामने प्रकट की और द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की। जिसके बाद भगवान जगन्नाथ ने उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए उन्हें रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। जिसके बाद से यहां हर साल जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं।


जगन्नाथ रथ यात्रा
                    
हमारे भारत देश के उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है। यह भारतीय संस्कृति की मुख्य धरोहर है । उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगन्नाथ जी ही माने जाते हैं। यहाँ के वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा जी और श्रीकृष्ण जी की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ जी ही हैं। इसी के प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ  जी से सम्पूर्ण जगत का उद्भव हुआ है। श्री जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। ऐसी मान्यता श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं की है। श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा यही से निकाली जाती है । इनका हमारी भारतीय संस्कृति मे विशेष महत्व है ।
               पूर्ण परात्पर भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरम्भ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं।


जगन्नाथ रथ यात्रा

          श्री जगन्नाथ रथ यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं एवं भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं मान्‍यताओं के अनुसार, जो भी व्‍यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्‍य प्राप्‍त होता है। यही इस रथ यात्रा की खाशीयत कही जा सकती है । इस रथ यात्रा मे श्रद्धालुओ की भीड भगवान के प्रति  श्रद्धा एवम् अटुट प्रेम को प्रदर्शित करती है।
        इस रथ यात्रा में भगवान जगन्‍नाथ, बहन सुभद्रा और बलरामजी तीनों के रथ अलग-अलग होते हैं। इन तीनों रथों को नगर में भ्रमण करवाया जाता है और फिर ये तीनों अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते हैं। यहां विभिन्‍न प्रकार के 56 भोग लगाकर तीनों की खातिरदारी की जाती है। 


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सोमवार, 22 जून 2020

हिंदु धर्म


 
हिंदु धर्म सबसे प्राचीन धर्म है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिन्दू धर्म 90 हजार वर्ष पुराना बताया जाता है । हिन्दू धर्म में सबसे पहले 9057 ईसा पूर्व, स्वायंभुव मनु हुए, 6673 ईसा पूर्व में वैवस्वत मनु हुए, भगवान श्रीराम जी का जन्म 5114 ईसा पूर्व और श्रीकृष्ण जी का जन्म 3112 ईसा पूर्व बताया जाता हैं । वर्तमान शोध के अनुसार 12 से 15 हजार वर्ष प्राचीन और ज्ञात रूप से लगभग 24 हजार वर्ष पुराना धर्म हिन्दू धर्म को माना जाता हैं । इस तरह हिंदु धर्म विश्व का सबसे पुराना धर्म माना जाता है । 

हिंदु धर्म



सनातन धर्म पृथ्वी के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है, हालाँकि इसके इतिहास के बारे में अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं। आधुनिक इतिहासकार हड़प्पा, मेहरगढ़ आदि पुरातात्विक अन्वेषणों के आधार पर इस धर्म का इतिहास कुछ हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं। जहाँ भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, भगवान शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, शिवलिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इन सब चिजो के मिलने के कारण ही हिंदु धर्म की प्राचीनता के बारे में पता चलता है । इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था। ये ही लोग आर्यंस कहलाते थे । पशुपालन इनकी जीविका का मुख्य साधन था ।

                  हिंदु धर्म

आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग १७०० ईसा पूर्व में आर्य अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गए। तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गए, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आए। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध और धर्मों के अलग हो जाने के बाद वैदिक धर्म में काफ़ी परिवर्तन आया। नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ। हिंदु धर्म के बारे मे अध्ययन करने से बहुत सारी रोचक बातो के बारे मे पता चलता है । इससे हमे पुरातत्व चिजो के बारे मे जानकारी प्राप्त होती है साथ ही प्राचीन धर्म हिंदु धर्म की विशालता एवम् प्राचीनता के बारे मे पता चलता है । 
                             हम आपको भारत की प्राचीन संस्कृति तथा सभ्यता आदि के बारे मे विस्तृत जानकारी प्रदान करते रहेंगे । 



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सोमवार, 15 जून 2020

ओडिशा में महानदी में मिला 500 साल पुराना मंदिर

हमारे भारत देश की संस्कृति विशाल है। यहां बहुत सारे प्राचीन मंदिर और प्राचीन इमारतें है जो कि तब पता चलता है जब इसकी खुदाई कि जाती है या पानी में डूबा हुआ मिलता है । यह हमारी भारतीय संस्कृति की रहस्य का उजागर करती है। आज इसी तरह समाचार में एक प्राचीन जगह का पता चला जो कि भारतीय संस्कृति से संबंधित है इसलिए उसके बारे में बताया जा रहा है। इसकी जानकारी हमारी प्राचीन चिजो मे जानने के लिये महत्वपुर्ण है ।
ओडिशा में महानदी में मिला 500 साल पुराना मंदिर
दीपक के नायक द्वारा बनाया गया


ओडिशा में महानदी में मिला 500 साल पुराना मंदिर

ओडिशा के नयागढ़ जिले में एक 500 साल पुराना मंदिर महानदी से बाहर आ गया । कई सालों पहले यह मंदिर डूब गया था। इसमें भगवान गोपीनाथ की प्रतिमाएं थीं, जिन्हें भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। यह एक प्राचीन मंदिर है।
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) की आर्केलॉजिकल सर्वे टीम ने हाल ही में दावा किया है कि उन्होंने कटक से महानदी में एक प्राचीन जलमग्न मंदिर की खोज की है।

  मंदिर 60 फीट लंबा था

जलमग्न मंदिर की चोटी की खोज नयागढ के पास पद्मावती गांव में बाडेश्वर के पास नदी के बीच में की गई थी। 60 फीट लंबा यह मंदिर 15वीं शताब्दी के आखिर या 16वीं शताब्दी की शुरुआत में बना था। अब से 11 साल पहले भी इसी तरह यह मंदिर पानी से बाहर आ गया था । 
प्रोजेक्ट असिस्टेंट दीपक कुमार नायक ने ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में रूचि रखने वाले रवीन्द्र कुमार राणा की मदद से यहां की जांच की थी। दीपक कुमार ने बताया कि गोपीनाथ मंदिर भगवान विष्णु का ही मंदिर था। यह प्राचीन मंदिर है और इसका पता लगना बहुत बडी उपलब्धी है।

 19वीं शताब्दी में नदी में डूबे कई गांव और मंदिर 

उन्होंने बताया कि पद्मवती गांव सतपतना का हिस्सा था, यानि वहां 7 गांव थे. 19वीं शताब्दी में नदी का स्तर बढ़ने के कारण यहां के लोग ऊंचे स्थानों पर जा बसे। इस दौरान गांव वालों ने न केवल खुद के स्थान को बदला, बल्कि मंदिर के देवताओं को भी अपने साथ ले गए। 

जल स्तर के बढ़ने से डूबे लगभग 22 प्राचीन मंदिर

रविंद्र राणा ने कहा कि पिछले एक साल में, बदलते जल स्तर के कारण इसे 4 से 5 दिनों तक देखा गया था. स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस जगह करीब 22 मंदिर थे, जो पानी का स्तर बढ़ने के बाद नदी में डूब गए।

 प्राचीन मंदिर के आस-पास के इलाके में लगातार हो रही है खोज

महानदी प्रोजेक्ट (INTACH) के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर अनिल धीर ने बताया, “हम महानदी के स्मारकों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। हम इस मंदिर के चारों तरफ पांच किलोमीटर के दायरे में और मंदिरों और धरोहरों की खोज कर रहे हैं। लोग पहले से ही जानते थे कि इसके नीचे एक मंदिर है।"
                           इस तरह महानदी प्रोजेक्ट के कारण हमे इतना पुराना मंदिर के बारे मे पता चला। इस तरह हमारे भारतीय संस्कृति ब्लाग मे हमारे ब्लाग से सम्बंधित प्राचीन चिजो के खोज की खबरे मिलती रहेंगी ।




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